Kaise hua shrifal ka janm mrityu lok par ? Aryavart Ki Kahaniya

 


Kaise hua shrifal ka janm mrityu lok par ? Aryavart Ki Kahaniyav #aryavrat #kahaniya हिन्दू धर्म में श्रीफल का विशेष महत्तव है। श्रीफल के बिना कोई भी धार्मिक कार्यक्रम संपन्न नहीं होता है। श्रीफल से जुडी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जो जिसके अनुसार श्रीफल का इस धरती पर जन्म ऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। आज हम आपको श्रीफल के जन्म से जुडी यही कहानी बता रहे है। यह कहानी राजा सत्यव्रत से जुड़ी है। सत्यव्रत बड़े पराकर्मी राजा थे, जिनका ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास था। उनके पास सब कुछ था लेकिन उनके मन की एक इच्छा थी जिसे वे किसी भी रूप में पूर्ण करना चाहते थे। वे चाहते थे की वे किसी भी प्रकार से पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जा सकें। स्वर्गलोक की सुंदरता उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी, किंतु वहां कैसे जाना है, यह सत्यव्रत नहीं जानते थे। एक बार ऋषि विश्वामित्र तपस्या करने के लिए हिमालय पर निकल गए थे और लम्बे समय से वापस नहीं आए थे। उनकी अनुपस्थिति में क्षेत्र में सूखा पड़ गया और उनका परिवार भूखा-प्यासा भटक रहा था। तब राजा सत्यव्रत ने उनके परिवार का पालन पोषण करने का निशचय किया। जब ऋषि विश्वामित्र वापस लौटे तो उन्हें परिवार वालों ने राजा की अच्छाई बताई। वे राजा से मिलने उनके दरबार पहुंचे और उनका धन्यवाद किया। शुक्रिया के रूप में राजा ने ऋषि विश्वामित्र द्वारा उन्हें एक वर देने के लिए निवेदन किया। ऋषि विश्वामित्र ने भी उन्हें अनुमति दी । तब राजा बोले की वो स्वर्गलोक जाना चाहते हैं, तो क्या ऋषि विश्वामित्र अपनी शक्तियों से उनके लिए स्वर्ग जाने का मार्ग बना सकते हैं? अपने परिवार की सहायता का उपकार मानते हुए ऋषि विश्वामित्र ने जल्द ही एक ऐसा मार्ग बनवाया जो सीधा स्वर्गलोक को जाता था। राजा सत्यव्रत खुश हो गए और उस मार्ग पर चलते हुए जैसे ही स्वर्गलोक के पास पहुंचे ही थे, कि स्वर्गलोक के देवता इन्द्र ने उन्हें नीचे की ओर धक्का दे दिया । धरती पर गिरते ही राजा ऋषि विश्वामित्र के पास आए और रोते हुए सारी घटना का वर्णन करने लगे। देवताओं के इस प्रकार के व्यवहार से ऋषि विश्वामित्र भी क्रोधित हो गए, परन्तु अंत में स्वर्गलोक के देवताओं से बात करके आपसी सहमति से एक हल निकाला गया। राजा सत्यव्रत के लिए अलग से एक स्वर्गलोक का निर्माण करने का आदेश दिया गया ये नया स्वर्गलोक पृथ्वी एवं असली स्वर्गलोक के मध्य में स्थित होगा, ताकि ना ही राजा को कोई परेशानी हो और ना ही देवी-देवताओं को किसी कठिनाई का सामना करना पड़े। राजा सत्यव्रत भी इस सुझाव से बेहद प्रसन्न हुए, किन्तु ना जाने ऋषि विश्वामित्र को एक चिंता ने घेरा हुआ था। उन्हें यह बात सत्ता रही थी कि धरती और स्वर्गलोक के बीच होने के कारण कहीं हवा के बहाव से यह नया स्वर्गलोक डगमगा ना जाए। यदि ऐसा हुआ तो राजा फिर से धरती पर आ गिरेंगे । इसका हल निकालते हुए ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्गलोक के ठीक नीचे एक खम्बे का निर्माण किया, जिसने उसे सहारा दिया। माना जाता है की यही खम्बा समय आने पर एक पेड़ में बदल गया और राजा सत्यव्रत का सिर एक फल बन गया। इसी पेड़ के श्रीफल का पेड़ और राजा के सिर को श्रीफल कहा जाने लगा। इसीलिए आज के समय में भी श्रीफल का पेड़ काफी ऊंचाई पर लगता है। इस कथा के अनुसार सत्यव्रत को समय आने पर एक ऐसे व्यक्ति की उपाधि दी गई ‘जो ना ही इधर का है और ना ही उधर का। यानी कि एक ऐसा मनुष्य जो दो धुरों के बीच में लटका हुआ है। नमस्कार दोस्तों 🙏🙏 कहानी कहने के बाद लप्सी तपसी की कहानी कही जाती है :- https://youtu.be/uGxyeQYBpDk धर्मराज जी की कथा :- https://youtu.be/1YWqt_pkBlE धर्मराज की कथा :- https://youtu.be/6ApM6NRj2RU राम लक्ष्मण की कहानी :- https://youtu.be/e4ArMg3L7Ic राई की कहानी :- https://youtu.be/jiAv03pF2uk सूरज भगवान की कहानी :- https://youtu.be/myymCNe8VUU सुखी अमावस्या की कहानी :- https://youtu.be/tv8U-slBQuI और Videos के लिये सब्सक्राइब करे : https://www.youtube.com/channel/UC6zU5hIzjDQ8I2jUxDFH5XQ?sub_confirmation=1 Facebook: - https://www.facebook.com/aryavat.ki.kahaniya/ Copyright Disclaimer: Under Section 107 of the Copyright Act 1976, allowance is made for "fair use" for purposes such as criticism, comment, news reporting, teaching, scholarship, and research. Fair use is a use permitted by copyright statute that might otherwise be infringing. Non-profit, educational, or personal use tips the balance in favor of fair use.

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